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रविवार, 17 सितंबर 2017

नवरात्रि शुद्ध पूजन विधि




माँ नवदुर्गा को इस बार प्रसन्न कीजिये उचित व शुद्ध पूजन विधि के द्वारा।
विधि की ईबुक तैयार हो गई है जो कि आप यहाँ से निःशुल्क या स्वेच्छा से डाऊनलोड कर सकते हैं
माँ दुर्गा आपकी समस्त प्रकार से रक्षा करें, समस्त पापों का विनाश करें, समस्त दुखों का विनाश करें, व आपकी झोली खुशियों से भर दे।


घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

जिन घरों में नवरात्रि पर घट-स्थापना होती है उनके लिए शुभ मुहूर्त 21 सितंबर को सुबह 06 बजकर 03 मिनट से लेकर 08 बजकर 22 मिनट तक का है। इस दौरान घट स्थापना करना अच्छा होता है।


किसी भी वक्त कलश स्थापित कर सकता है

वैसे नवरात्र के प्रारंभ से ही अच्छा वक्त शुरू हो जाता है इसलिए अगर जातक शुभ मुहूर्त में घट स्थापना नहीं कर पाता है तो वो पूरे दिन किसी भी वक्त कलश स्थापित कर सकता है क्योंकि मां दुर्गा कभी भी अपने भक्तों का बुरा नहीं करती हैं।
  • अभिजीत मुर्हूत 11.36 से 12.24 बजे तक है।
  • देवी बोधन 26 सितंबर मंगलवार को होगा। 
  • बांग्ला पूजा पद्धति को मानने वाले पंडालों में उसी दिन पट खुल जाएंगे। 
  • जबकि 27 सितंबर सप्तमी तिथि को सुबह 9.40 बजे से देर शाम तक माता रानी के पट खुलने का शुभ मुहूर्त है।
नवरात्र में मां के 9 रूपों की पूजा होती है...

  • 21 सितंबर 2017 : मां शैलपुत्री की पूजा 
  • 22 सितंबर 2017 : मां ब्रह्मचारिणी की पूजा 
  • 23 सितंबर 2017 : मां चन्द्रघंटा की पूजा 
  • 24 सितंबर 2017 : मां कूष्मांडा की पूजा 
  • 25 सितंबर 2017 : मां स्कंदमाता की पूजा 
  • 26 सितंबर 2017 : मां कात्यायनी की पूजा 
  • 27 सितंबर 2017 : मां कालरात्रि की पूजा 
  • 28 सितंबर 2017 : मां महागौरी की पूजा 
  • 29 सितंबर 2017 : मां सिद्धदात्री की पूजा
  • 30 सितंबर 2017: दशमी तिथि, दशहरा


बुधवार, 13 सितंबर 2017

सर्व कार्य सिद्धि के लिये शाबर मंत्र

यदि आप शाबर मंत्र साधना में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं  और आप चाहते हैं कि आपको  हर शाबर मंत्र सिद्ध करने पर  सफलता निश्चित ही रूप से प्राप्त हो तो  आज मैं आपके सामने एक ऐसा ही  सर्व कार्य सिद्धि  साबर मंत्रों को पेश कर रहा हूं और यह शाबर मंत्र हर प्रकार की शाबर साधना मे सफलता प्राप्त करने के लिये और साथ ही घर में सुख शांति का माहौल बनाने के लिए बहुत ही अच्छा वह अनेकों बार आजमाया गया प्रयोग है आप भी इसको अपनाएं और फायदा उठाएं।



इस मंत्र को सिद्ध करने के लिए तीन माला 11 दिन तक लगातार जपने से मंत्र सिद्ध हो जायेगा सिद्ध होने के पश्चात इसका प्रयोग करें।


॥ॐ नमो आदेश गुुरु को


 नमो देवी सर्वकार्य सिद्धकरणी 


जो पाती पूरेब्रह्म, विष्णु, महेश तीनों देवतन 


मेरी भक्तिगुरु की शक्ति।

चल शब्द मन्त्र की तान

तू ना चले तो गुरु गोरख की आन।।


मंत्र का प्रयोग करने के लिए पहले मंत्र का सिद्ध होना आवश्यक है और जब मंत्र आप सिद्ध कर लेते हैं और इसके पश्चात ही आप इसका प्रयोग करें जो कि इस तरह से हैं :

1. जब कभी भी आप किसी भी शाबर मंत्र की साधना करते हैं तो आप गुरु गणेश पूजन के बाद सबसे पहले उपरोक्त इस मंत्र की माला एक जप करें और उसके पश्चात आप जिस मंत्र को सिद्ध करना चाहते हैं उसे जपना शुरु करें।
जब उस मंत्र का जप पूरा हो जाए पश्चात उसके पुनः इसी मंत्र का एक माला जाप और करें। साधना चाहे एक दिवसीय3, 5, 11 हो अथवा अधिक दिवसीय आपको यह प्रयोग जब तक मंत्र की साधना की जाती है तब तक इसका प्रयोग करते रहना है ऐसा करने से मंत्र की सिद्धि निश्चित है।

2. दूसरा प्रयोग इसका इस तरह से है कि यदि आपके घर में परेशानी का माहौल है आपके कोई भी कार्य नहीं बन रहे हैं चाहे वह रिश्ते-नाते की बात को आपसी विचार हो रोजगार की समस्या हो घरेलू या तंत्र की समस्या हो उन सभी समस्याओं से ईसी एक मंत्र से निजात पाई जा सकती है उसके लिए पहले तो यह मंत्र होली दिवाली ग्रहण दशहरा नवरात्रि शिवरात्रि आदि महा पर्व से शुरू करें और 11 दिन तक रोज तीन माला जप कर इसे सिद्ध करें।
सिद्ध होने के पश्चात रोज प्रातः व् साँय कालीन पूजा के समय कम से कम 21 बार किया ज्यादा से ज्यादा एक माला का जाप रोज करें ऐसा करने से आपकी सभी बातें दूर हो जाएगी

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

शाबर मन्त्रो की उत्पत्ति

‘साबर’ या “शबर” शब्द का पर्यायवाची अर्थ ग्रामीण, अपरिष्कृत, असभ्य आदि होता है | ‘साबर-तन्त्र’ – तन्त्र की ग्राम्य (ग्रामीण) शाखा है | इसके प्रवर्तक भगवान् शंकर स्वयं प्रत्यक्षतया नहीं है, किन्तु जिन सिद्ध-साधको ने इसका आविष्कार किया, वे जरुर परम-शिव-भक्त अवश्य थे | गुरु गोरखनाथ तथा गुरु मछिन्दर नाथ ‘साबर-मन्त्र’ के जनक माने जाते हैं | तथा गोरखनाथ जी ही मुख्यतः शाबर मन्त्रो के प्रचारक माने जाते है | वे   अपने तपोबल से वे भगवान् शंकर के समान पूज्य माने जाते हैं | अपनी साधना के कारण वे मन्त्र-प्रवर्तक ऋषियों के समान विश्वास और श्रद्धा के पात्र हैं | ‘सिद्ध’ और ‘नाथ’ सम्प्रदायों ने मिलकर परम्परागत मन्त्रों के मूल सिद्धान्तों को लेकर आम बोल-चाल की भाषा को अटपटे स्वरूप देकर उन शब्दों को शाबर मन्त्रो का दर्जा दिया गया |
‘साबर’-मन्त्रों में ‘दुहाई’, ‘गाली’, ‘आन’ और ‘शाप’, ‘श्रद्धा’ और ‘धमकी’ इन सबका  प्रयोग किया जाता है | साधक अपने शाबर मन्त्र के देव के समक्ष ‘बालक’ या ‘याचक’ बनकर देवता को सब कुछ कहता है और उसी से सब कुछ कराना चाहता है | जिस प्रकार एक बालक अपने माता पिता से अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करने के लिए कुछ भी अनाप-शनाप कह देता है | और तो और आश्चर्य यह है कि उस साधक की यह ‘दुहाई’, ‘गाली’, ‘आन’ और ‘शाप’, ‘श्रद्धा’ और ‘धमकी’ भी काम करती है | ‘दुहाई’, ‘आन’ का अर्थ है – सौगन्ध, कसम देकर कार्य करवाने को बाध्य करना |

तांत्रिक व् शास्त्रीय प्रयोगों में इस प्रकार की ‘दुहाई’, ‘गाली’, ‘आन’ और ‘शाप’, ‘श्रद्धा’ और ‘धमकी’ आदि नहीं दी जाती है | ‘साबर’-मन्त्रों की रचना में हमे संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, और कई क्षेत्रीय भाषाओं का समायोजन मिलता है तो कुछ मन्त्रों में संस्कृत और मलयालय, कन्नड़, गुजराती, बंगाली या तमिल भाषाओं का मिश्रित रुप मिलेगा, तो किन्हीं में शुद्ध क्षेत्रीय भाषाओं की ग्राम्य-शैली भी मिल जाती है |

हालाँकि हिन्दुस्तान में कई तरह की भाषाओ का प्रयोग व्यवहार में लाया जाता है फिर भी इसके बड़े भू-भाग में बोली जाने वाली भाषा ‘हिन्दी’ ही है | अतः अधिकांश ‘साबर’ मन्त्र हिन्दी में ही देखने-सुनने को मिलते हैं | इस मन्त्रों में शास्त्रीय मन्त्रों के समान ‘षड्न्गन्यास’ – ऋषि, छन्द, बीज, शक्ति, कीलक और देवता आदि की प्रक्रिया अलग से नहीं रहती, अपितु इन अंगों का वर्णन मन्त्र में ही सम,समाहित रहता है | इसलिए प्रत्येक ‘साबर’ मन्त्र अपने आप में पूर्ण होते है | उपदेष्टा ‘ऋषि’ के रुप में गोरखनाथ, लोना चमारिन, योगिनी, मरही माता, असावरी देवी, सुलेमान जैसे सिद्ध-पुरुष हैं | कई मन्त्रों में इनके नाम लिए जाते हैं और कईयों में केवल ‘गुरु के नाम से ही काम चल जाता है |
‘पल्लव’ (शास्त्रीय मन्त्रो के अन्त में लगाए जाने वाले शब्द आदि) के स्थान पर
‘शब्द साँचा पिण्ड काचा, फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा’
वाक्य ही सामान्यतः रहता है | इस वाक्य का अर्थ है-

“शब्द (अक्षर/ध्वनि) ही सत्य है, नष्ट नहीं होती |
यह देह (शरीर) अनित्य (हमेशा न रहने वाला) है, बहुत कच्चा है |
हे मन्त्र | तुम ईश्वर की वाणी हो (ईश्वर के वचन से प्रकट होवो)”


इसी प्रकार
‘मेरी भक्ति गुरु की शक्ति
फुरो मन्त्र ईश्वरी वाचा’
और उपरोक्त वाक्य का अर्थ है
“मेरी भक्ति (विश्वास/ श्रद्धा) की ताकत से |
मेरे गुरु की शक्ति से |
हे मन्त्र | तुम ईश्वर की वाणी होकर चलो (ईश्वर के वचन से प्रकट होवो)”

या इससे मिलते-जुलते दूसरे शब्द आदि शाबर मन्त्रों के ‘पल्लव’ होते है |

अन्य मत के अनुसार शाबर मन्त्रो की उत्पत्ति

कहा जाता है कि द्वापरयुग में भगवान् श्री कृष्ण की आज्ञा पाकर अर्जुन ने पशुपति अस्त्र की प्राप्ति के लिए भगवान् शिव की तपस्या शुरू की | एक दिन भगवान् शिव एक शिकारी का भेष बनाकर आये और जब पूजा के बाद अर्जुन ने सुअर पर बाण चलाया तो ठीक उसी वक़्त भगवान् शिव ने भी उस सुअर को तीर मारा अब दोनों में सूअर के हकदारी का विवाद हो गया और शिकारी रुपी शिव ने अर्जुन से कहा- “मुझसे युद्ध करो जो युद्ध में जीत जायेगा सुअर उसी को दीया जायेगा” | अर्जुन और भगवान् शिव में युद्ध शुरू हुआ (इसी युद्ध की महाभारत में किरात युद्ध कहा गया है) | युद्ध देखने के लिए माँ पार्वती भी शिकारी का भेष बना वहां आ गयी और युद्ध देखने लगी तभी भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा- “जिसका रोज तप करते हो वही शिकारी के भेष में साक्षात् खड़े है” |  अर्जुन ने भगवान् शिव के चरणों में गिरकर प्रार्थना की और भगवान् शिव ने अर्जुन को अपना असली स्वरुप दिखाया |
  अर्जुन भगवान् शिव के चरणों में गिर पड़े और पशुपति अस्त्र के लिए प्रार्थना की, भगवान शिव ने अर्जुन को इच्छित वर दिया, उसी समय माँ पार्वती ने भी अपना असली स्वरुप दिखाया | जब शिव और अर्जुन में युद्ध हो रहा था तो माँ भगवती शिकारी का भेष बनाकर बैठी थी और उस समय अन्य शिकारी जो वहाँ युद्ध देख रहे थे उन्होंने जो मॉस का भोजन किया वही भोजन माँ भगवती को शिकारी समझ कर खाने को दिया अत: माता ने वही भोजन ग्रहण किया इसलिए जब माँ भगवती अपने असली रूप में आई तो उन्होंने ने भी शिकारीओं से प्रसन्न होकर कहा- “हे किरातों मैं आप सब से प्रसन्न हूँ , वर मांगो” | इस पर शिकारीओं ने कहा- “हे माँ हम भाषा व्याकरण नहीं जानते और ना ही हमे संस्कृत का ज्ञान है और ना ही हम लम्बे चौड़े विधि विधान कर सकते है पर हमारे मन में भी आपकी और महादेव की भक्ति करने की इच्छा है, इसलिए यदि आप प्रसन्न है तो भगवान शिव से हमे ऐसे मंत्र दिलवा दीजिये जिससे हम सरलता से आप का पूजन कर सके” |

माँ भगवती की प्रसन्नता देख और भीलों की भक्ति भावना देख कर आदिनाथ भगवान् शिव ने आगे चलकर नाथ सम्प्रदाय में साबर मन्त्रों की रचना की | नाथ पंथ में भगवान् शिव को “आदिनाथ” कहा जाता है और माता पार्वती को “उदयनाथ” कहा जाता है भगवान् शिव जी ने यह विद्या भीलों को प्रदान की और बाद में यही विद्या दादा गुरु मत्स्येन्द्रनाथ को मिली, उन्होंने इस विद्या का बहुत प्रचार प्रसार किया और अन्य कई करोड़ साबर मन्त्रों की रचना की उनके बाद उनके शिष्य गुरु गोरखनाथ जी ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया और नवनाथ एवं चौरासी सिद्धों के माध्यम से इस विद्या का बहुत प्रचार हुआ | और ऐसा भी कहा जाता है कि योगी कानिफनाथ जी ने 5 करोड़ साबर मन्त्रों की रचना की और वही चर्पटनाथ जी ने 16 करोड़ मन्त्रों की रचना की और योगी जालंधरनाथ जी ने 30 करोड़ साबर मन्त्रों की रचना की इन योगीयो के बाद अनन्त कोटि नाथ सिद्धों ने साबर मन्त्रों की रचना की यह साबर विद्या नाथ पंथ में गुरु शिष्य परम्परा से मौखिक रिवाज के आधार पर आगे बढ़ने लगी, इसलिए साबर मंत्र चाहे किसी भी प्रकार का क्यों ना हो उसका सम्बन्ध किसी ना किसी नाथ पंथी योगी से अवश्य होता है | अतः यह कहना गलत ना होगा कि साबर मंत्र नाथ सिद्धों की देन है |


Pitru Dosh Shanti | Kaal Sarp Dosh Niwaran |पितृदोष शांति

Pitru Dosh Shanti | Kaal Sarp Dosh Niwaran |पितृदोष शांति


आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष (पितृ = पिता) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।

पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।


पितृदोष / ऋण की शांति के 11 सरल और सस्ते उपाय करने से पितृ दोष में शान्ति मिलती है !!

ज्योतिष में पितृदोष का बहुत महत्व माना जाता है। प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में पितृदोष सबसे बड़ा दोष माना गया है। इससे पीड़ित व्यक्ति का जीवन अत्यंत कष्टमय हो जाता है। जिस जातक की कुंडली में यह दोष होता है उसे धन अभाव से लेकर मानसिक क्लेश तक का सामना करना पड़ता है। पितृदोष से पीड़ित जातक की उन्नति में बाधा रहती है। आमतौर पर पितृदोष के लिए खर्चीले उपाय बताए जाते हैं लेकिन यदि किसी जातक की कुंडली में पितृ दोष बन रहा है और वह महंगे उपाय करने में असमर्थ है तो भी परेशान होने की कोई बात नहीं। पितृदोष का प्रभाव कम करने के लिए ऐसे कई आसान, सस्ते व सरल उपाय भी हैं जिनसे इसका प्रभाव कम हो सकता है।

1. कुंडली में पितृ दोष बन रहा हो तब जातक को घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने स्वर्गीय परिजनों का फोटो लगाकर उस पर हार चढ़ाकर रोजाना उनकी पूजा स्तुति करना चाहिए। उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है।

2. अपने स्वर्गीय परिजनों की निर्वाण तिथि पर जरूरतमंदों अथवा गुणी ब्राह्मणों को भोजन कराए। भोजन में मृतात्मा की कम से कम एक पसंद की वस्तु अवश्य बनाएं।

3. इसी दिन अगर हो सके तो अपनी सामर्थ्यानुसार गरीबों को वस्त्र और अन्न आदि दान करने से भी यह दोष मिटता है।

4. पीपल के वृक्ष पर दोपहर में जल, पुष्प, अक्षत, दूध, गंगाजल, काले तिल चढ़ाएं और स्वर्गीय परिजनों का स्मरण कर उनसे आशीर्वाद मांगें।

5. शाम के समय में दीप जलाएं और नाग स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र या रुद्र सूक्त या पितृ स्तोत्र व नवग्रह स्तोत्र का पाठ करें। इससे भी पितृ दोष की शांति होती है।

6. सोमवार प्रात:काल में स्नान कर नंगे पैर शिव मंदिर में जाकर आक के 21 पुष्प, कच्ची लस्सी, बिल्वपत्र के साथ शिवजी की पूजा करें। 21 सोमवार करने से पितृदोष का प्रभाव कम होता है।

7. प्रतिदिन इष्ट देवता व कुल देवता की पूजा करने से भी पितृ दोष का शमन होता है।

8. कुंडली में पितृदोष होने से किसी गरीब कन्या का विवाह या उसकी बीमारी में सहायता करने पर भी लाभ मिलता है।

9. ब्राह्मणों को प्रतीकात्मक गोदान, गर्मी में पानी पिलाने के लिए कुंए खुदवाएं या राहगीरों को शीतल जल पिलाने से भी पितृदोष से छुटकारा मिलता है।

10. पवित्र पीपल तथा बरगद के पेड़ लगाएं। विष्णु भगवान के मंत्र जाप, श्रीमद्‍भागवत गीता का पाठ करने से भी पित्तरों को शांति मिलती है और दोष में कमी आती है।

11. पितरों के नाम पर गरीब विद्यार्थियों की मदद करने तथा दिवंगत परिजनों के नाम से अस्पताल, मंदिर, विद्यालय, धर्मशाला आदि का निर्माण करवाने से भी अत्यंत लाभ मिलता है।

पित्र दोष निवारण मन्त्र

मन्त्र 1 -- ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः ।
मन्त्र २-- ॐ प्रथम पितृ नारायणाय नमः ।।
मँत्र 3  - ॐ देवताभव्य: पतृ:भ्य महायोगीभ्यश्च ।
 नम: स्वाहाय स्वाधाय पतृभ्यो नमोस्तुते : ।।
140000 , जप करावे। या गायत्री मँत्र का 140000 जप कराये ।

4 - त्रिपिण्डी , नारायण बली, गया श्राद्ध , भागवत की कथा , करावे ।
एक माला रोज अगर घर का मुखिया या अन्य सदस्य करें तो बहुत लाभ होता है

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